Thursday, 17 September 2020

Tu balatkari hai

 

तू बलात्कारी है, तू व्यभिचारी है, 

नारी की प्रतिष्ठा का एक शिकारी है। तू बलात्कारी है 

तूने वो सब ले लिया, उसे जो वापस नहीं मिलेगा। 

मन का ये मुरझा गया सुमन, फिर से नहीं खिलेगा। 
वह एक कली थी, अब उम्र से पहले फूल हो गयी, 
क्षत विक्षत हो गया, वक्ष उसका, फिर नहीं सिलेगा। 

ढोना पड़ेगा जीवन भर,  तुझको ये पाप भारी है। 

तू बलात्कारी है। 


बिखर गए हैं सपने उसके, मरने को जी होता है। 

अपने रक्तपात को सोच, हृदय उसका रोता है।  

आहत हृदय की असह्य, व्यथा लिए नित कराहती,  

जाग रात को चीत्कारें मारती, जब जग सोता है। 

दूर खड़ा दानव भी सुना, जब वो चीत्कारी है।  

तू बलात्कारी है। 


वो काला दानवी चेहरा, वह कदापि न भूलेगी।  

छाया जो वो घोर अँधेरा, वह कदापि न भूलेगी।  

रेता जा रहा था हवस की धार से वक्ष को उसके,   

ह्रदय चीर कर घाव उकेरा, वह कदापि न भूलेगी। 

फेंके गए पैसे उस पर, जैसे कोई भिखारी है।  

तू बलात्कारी है। 

 

लगा कि ऊपर रखा, अति विशाल एक पत्थर था।  

मनुष्य को लीलने वाला, जैसे कोई विषधर था।  

वे दाहक स्पर्श, चिता की अंगारों से जलाते रहे,  

जैसे मुख से ज्वाला फेंकते, समक्ष कोई तमचर था।  

सोचा तूने वह पदार्थ एक, और अबला  नारी है।  

तू बलात्कारी है। 



कइयों ने समझाया उसे,  भूल जाए मगर कैसे ?

भूल भी पायेगा कभी, वीभत्सता को नगर कैसे?

फटे हुए चित्र सा वो, मुखड़े के है चिथड़े लिए,  

चल पायेगी सहजता से, अब वह उसी डगर कैसे?

जीवन पर रख दिया जो तूने,  हर बोझ से भारी है। 

तू बलात्कारी है। 

कई दिनों तक  जैसे वह, जमीन के नीचे गड़ी रही। 

अनजाने किन्हीं अंधेरों में, मृतक की भांति पड़ी रही।  

छैनी और हथौड़ा लिए तू बदन को छीलता रहा, 

किसी जड़ शिला की भांति, उस दिन वो जड़ी रही। 

शाप तू अवश्य भोगेगा, लांघी मर्यादा सारी है।   

तू बलात्कारी है। 


अपनी अबला के चोले से अब बाहर वह कढ़ेगी। 

आत्म सुरक्षा के प्रभावी और प्रबल शस्त्र गढ़ेगी।  

बहुत सह चुकी है अब तक, अब और नहीं सहेगी,  

तेरे जैसे दैत्य दानवों से वह खुलकर के लड़ेगी।

अत्याचारों से जीतने को खड्ग हाथ में धारी है। 
तू बलात्कारी है। 

 


 

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